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मंगलवार, 17 मार्च 2009

फूलोँ की क्यारियों में ......मेरे ख्वाब ..

फूलों की क्यारियों में ,
हाथों में ले के हाथ |
नज़रों में ख्वाब ले के,
मह्केगें साथ साथ |

चाँदी की होंगी रातें ,
महुए की होगी छाँव |
वो दिलरुबा के वादों ,
कसमों का होगा साथ ||

एकांत में हो बातें ,
दरिया का हो किनारा |
बरसा करें घटाएं ,
अच्छा है उनका साथ ||

अरमाँ उन्हें बताएं ,
गोदी में रख के माथ |
अधरों पे प्यास ले के ,
दहकेंगे साथ -साथ ||

पलकें हों ऐसे भारी ,
बोझिल फलों से डाली |
झूमेगा जब भी ये मन ,
बहकेंगे साथ -साथ ||

हो चाँदनी भी रौशन ,
वो जब भी पास आयें |
जी भर करेंगे बातें ,
चहकेंगे साथ- साथ ||

मेरे ख्वाब उनको
लायेंगे मेरे साथ -साथ....
फूलों की क्यारियों में ,
हम होंगे साथ -साथ .......

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

मेरे ख्वाब तुझको लाते .....


मेरे ख्वाब तुझको लाते ,
हैं मेरे आस -- पास ..
हर ख्वाब से मै पूछूं ,
यूं तू ही क्यूँ है ख़ास ॥

क्यूँ दूर रहती मुझसे ,
मेरे दिल में तेरा वास ..
ख़्वाबों में गुमशुदा हो ,
इस गम में हूँ उदास ॥

तेरा रोम-रोम महके,
सुरभित है उच्छ्वास ..
ख़्वाबों में इस तरह ,
तू आये मेरे पास ॥

पंखों से हल्के हो के ,
उड़ने की ले के आस ..
फूलों की क्यारियों में ,
हम होंगे आस--पास ॥

इक ख्वाब का समुंदर ,
इक दर्दे-दिल हो पास ..
मै डुबकी लेता जब भी ,
मुझको हो तेरा भास ॥

मेरे ख्वाब तुझको लाते .........

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008

धोखा देते हैं वो इरादों को

धोखा देते हैं वो इरादों को ,
झूठी क़समें वो अगर -खाते हैं ...
रोशन करते हैं वो चिरागों को ,
रातों को जब भी नज़र -आते हैं ...
दिन तो तंग पड़ता इन ख़्वाबों को ,
इसलिए उनकी नज़र -रातें हैं ...
दूर रखते हैं ख़ुद से ख़्वाबों को ,
यूं भी वो दिल पे असर-ढाते हैं ...
लम्हा-लम्हा भुला के यादों को ,
लम्हा -लम्हा वो ख़बर -पाते हैं ...
ज़ुबां क्यूँ नाम दे गुनाहों को ,
बेजुबाँ यूं भी बशर -भाते हैं ...
भूल के जाम के किनारों को,
डूब अन्दर क्यूँ नज़र -आते हैं ...
नज़रें जब जाम दें पनाहों को ,
रह गयी होगी क़सर - बातें हैं ...
धोखा देते हैं , वो, इरादों को .........

रविवार, 5 अक्टूबर 2008

तुझे ढूँढता हूँ मैं

मेरे दिल दिमाग पर ही , छाया है तेरा वजूद |
मै जगता हूँ या हूँ सोता , तुझे ढूँढता हूँ मै ||

न जाने किस तरह से , तूने ले लिया मेरा नाम |
उस नाम की ध्वनि में , तुझे ढूँढता हूँ मै ||

रातों को अक्सर आते , ही हैं तेरे अक्स और ख्वाब |
सुबह को आंख खुलने पर , तुझे ढूँढता हूँ मैं ||

ठंडी हवा की खुशबू में, कुछ है तेरा अहसास |
उस खुशबू और खुमारी में , तुझे ढूँढता हूँ मैं ||

काली और स्याह रातों , को जो ख़त्म करेगी |
सुंदर , सुनहरी किरणों में , तुझे ढूँढता हूँ मैं ||

धरती पे बिछ गयी है, चादर जो चांदनी |
उस चांदनी की रोशनी में , तुझे ढूँढता हूँ मैं ||

मेरे दिल के सागरों में , तेरा नाम देता लहरें |
लहरों की वादियों में , तुझे ढूँढता हूँ मैं ||

मेरे दिल दिमाग पर ही .........

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2008

इक शमा और


प्यास महफ़िल की बुझा लूँ तो कहीं और चलूँ
इक शमा और जला लूँ तो कहीं और चलूँ |
झलक महबूब की है मेरे जो ख्वाबों में रही ,
दिले नादां में बसा लूँ तो कहीं और चलूँ |
ये ज़िन्दगी मेरी, देती है रंगी सपने ,
सूनी आँखों में बसा लूँ तो कहीं और चलूँ |
मिलन के बाद बिछड़ने के विरह की ये व्यथा ,
भीगी पलकों में छिपा लूँ तो कहीं और चलूँ |
मुकुट उंगली के तेरे नर्म हंसी पोरों का ,
बिखरी जुल्फों में सजा लूँ तो कहीं और चलूँ |
भटके हुये ख्वाब सजा लूँ तो कहीं और चलूँ,
एक ग़ज़ल और सुना लूँ तो कहीं और चलूँ |
"अनुपम " सपने हैं तेरे आँचल में ,
ख्वाब आंखों में सजा लूँ तो कहीं और चलूँ |
इक शमा और .........
अनुपम अग्रवाल