महफ़िल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
महफ़िल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2008

इक शमा और


प्यास महफ़िल की बुझा लूँ तो कहीं और चलूँ
इक शमा और जला लूँ तो कहीं और चलूँ |
झलक महबूब की है मेरे जो ख्वाबों में रही ,
दिले नादां में बसा लूँ तो कहीं और चलूँ |
ये ज़िन्दगी मेरी, देती है रंगी सपने ,
सूनी आँखों में बसा लूँ तो कहीं और चलूँ |
मिलन के बाद बिछड़ने के विरह की ये व्यथा ,
भीगी पलकों में छिपा लूँ तो कहीं और चलूँ |
मुकुट उंगली के तेरे नर्म हंसी पोरों का ,
बिखरी जुल्फों में सजा लूँ तो कहीं और चलूँ |
भटके हुये ख्वाब सजा लूँ तो कहीं और चलूँ,
एक ग़ज़ल और सुना लूँ तो कहीं और चलूँ |
"अनुपम " सपने हैं तेरे आँचल में ,
ख्वाब आंखों में सजा लूँ तो कहीं और चलूँ |
इक शमा और .........
अनुपम अग्रवाल