रविवार, 14 दिसंबर 2008

कैसे सिखाऊँ तुमको ..

हमने वफ़ा भी सीखी , तुमने सुकूँ ना पाना ,
कैसा अजीब लगता है,तुमको दिल लगाना |
इस शहर की बाँहों में , निकलोगे राहों में ,
बैठा है इक सवाली , तेरे नाम का दीवाना |
कैसे यकीन करोगे ,इस दिल की चाहतों पे ,
तेरे नाम से है रोशन , वरना है वीराना |
जब से कहीं मिले हो , रुख पे बढ़ी है लाली ,
आँखें झुकी हुई हैं , नूर हुआ नज़राना |
तेरे कदम से रोशन , होगा गरीबखाना ,
आदत सी हो गयी है,जी भर के तडपाना |
दर-दर की ठोकरें जो ,तेरे नाम पे हैं खायीं,
ज़ाहिर तो तब करेंगे , आओ गरीबखाना |
चाहो तो मत संवारो ,मेरा नसीब दिलबर ,
तुझको ही मै तो जानूँ , बाकी हूँ अन्जाना |
ना चाहो तो ना आओ , हमदम गरीबखाना ,
कैसे सिखाऊँ तुमको , वादों का अब निभाना |
हमने वफ़ा भी सीखी .........



31 टिप्‍पणियां:

विवेक सिंह ने कहा…

एकबार टिप्पणी कर हमको भी है बताना .
हमको पसन्द आया ये आपका तराना .

mehek ने कहा…

बहुत ही बढ़िया रही ये ग़ज़ल बहुत बधाई

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत सुन्दर गीत लिखा है।बधाई।

MANVINDER BHIMBER ने कहा…

तेरे कदम से रोशन , होगा गरीबखाना ,
आदत सी हो गयी है,जी भर के तडपाना |
दर-दर की ठोकरें जो ,तेरे नाम पे हैं खायीं,
ज़ाहिर तो तब करेंगे , आओ गरीबखाना |
चाहो तो मत संवारो ,मेरा नसीब दिलबर ,
तुझको ही मै तो जानूँ , बाकी हूँ अन्जाना |
बहुत सुन्दर गीत लिखा है।

"अर्श" ने कहा…

अग्रवाल साहब नमस्कार,
बहोत ही बेहतरीन ग़ज़ल लिखी है आपने बहोत ही बढ़िया .. बधाई स्वीकारें...


आभार
अर्श

Shashwat Shekhar ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Shashwat Shekhar ने कहा…

"चाहो तो मत संवारो ,मेरा नसीब दिलबर ,
तुझको ही मै तो जानूँ , बाकी हूँ अन्जाना"

बहुत खूब

PREETI BARTHWAL ने कहा…

बहुत ही खूब लिखा है धन्यवाद

राज भाटिय़ा ने कहा…

अग्रवाल साहब क्या बात है...
दर-दर की ठोकरें जो ,तेरे नाम पे हैं खायीं,
ज़ाहिर तो तब करेंगे , आओ गरीबखाना |
बहुत खुब
धन्यवाद

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत लाजवाब गजल !

राम राम !

dr. ashok priyaranjan ने कहा…

अच्छा िलखा है आपने । मैने अपने ब्लाग पर एक लेख िलखा है -आत्मिवश्वास के सहारे जीतें िजंदगी की जंग-समय हो तो पढें और कमेंट भी दें-

http://www.ashokvichar.blogspot.com

seema gupta ने कहा…

चाहो तो मत संवारो ,मेरा नसीब दिलबर ,
तुझको ही मै तो जानूँ , बाकी हूँ अन्जाना |
" बहुत सुंदर भावों की अभिव्यक्ति , ये शेर खास तौर से पसंद आया"

Regards

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

aap bahut hi accha likhte hai . mujhe aapki gazal acchi lagi

bahut badhai ,

vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/

BrijmohanShrivastava ने कहा…

अग्रवाल साहेब बहुत सुंदर /नाम से रोशन होना ,मिलने पर लाली चेहरे पर आजाना ""उनके देखे से जो आजाती है मुह पर रौनक ,वो समझते है बीमार का हाल अच्छा है बहुत अच्छा लिखा है आपने "" न चाहो तो न आओ ठीक ठीक तो है --तू है हरजाई तो अपना भी यही कौल सही ,तू नही और सही और नही और सही / बैठा है एक सवाली तेरे नाम का दीवाना / नाम की तो महत्ता ही निराली है +कलजुग केवल नाम अधारा ""
सर बुरा मत मानियेगा यही तो उम्र है थोड़े हंसने बोलने की

गौतम राजरिशी ने कहा…

अच्छे शब्द संयोजन हैं..मगर गज़ल नहीं कह सकते हैं इसको.
चलिये गज़लनुमा कविता कह लेते हैं..

दुसरी पंक्ती "कैसा अजीब लगता है,तुमको दिल लगाना " ठीक तरह से बैठ नहीं पा रही है पहले मिस्‍रे के साथ.

ये दो पंक्तियाँ "कैसे यकीन करोगे ,इस दिल की चाहतों पे ,तेरे नाम से है रोशन , वरना है वीराना " तो जबरदस्त हैं

"तेरे कदम से रोशन , होगा गरीबखाना ,
आदत सी हो गयी है,जी भर के तडपाना"...इन दो पंक्तियों में भी कुछ सामंजस्य नहीं बैठ रहा है

...आपने निष्पक्ष राय माँगी थी.अपने छोटी समझ से कहा है जो भी कहा है उपर.अन्यथा न लिजियेगा

अक्षय-मन ने कहा…

काफी समय बाद पढा आपको फिर से वो दिल के तार छेड़ दिए
दर-दर की ठोकरें जो ,तेरे नाम पे हैं खायीं,
ज़ाहिर तो तब करेंगे , आओ गरीबखाना
ये कमाल का शेर है एक दम बिजली के जैसा पूरे तन-बदन में फ़ैल जाता है

बहुत अच्छा लिखा है ..........

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

वाह.. दादा वाह.. क्या बात है... अर्थपूर्ण भावाभिव्यक्ति... बधाई स्वीकारिये..

swati ने कहा…

sundar........
swati

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

भाई अनुपम जी,
प्रस्तुति ने अहसास-ए-दिल करा ही दिया कि

जब से कहीं मिले हो , रुख पे बढ़ी है लाली ,
आँखें झुकी हुई हैं , नूर हुआ नज़राना |

सुंदर प्रस्तुति.
बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त

प्रकाश बादल ने कहा…

भाई विवेक सिंह ने गाया जो गाना, मुझे भी है वही दोहराना। आप लिखते रहे सदियों तक लिखने का मिलता रहे आपको खूबसूरत कोई बहाना।

VisH ने कहा…

हमने वफ़ा भी सीखी , तुमने सुकूँ ना पाना ,
कैसा अजीब लगता है,तुमको दिल लगाना |
इस शहर की बाँहों में , निकलोगे राहों में ,
बैठा है इक सवाली , तेरे नाम का दीवाना |
pahla sher hi....thaan kar gaya....maja aa gaya....wahh aap to shabdon ke bajigar lagte hai......

Jay Ho Magalmay Ho.....

Abhishek ने कहा…

दर-दर की ठोकरें जो ,तेरे नाम पे हैं खायीं,
ज़ाहिर तो तब करेंगे , आओ गरीबखाना |
खूब लिखा है आपने. अच्छी लगी कविता आपकी. धन्यवाद.

शोभा ने कहा…

चाहो तो मत संवारो ,मेरा नसीब दिलबर ,
तुझको ही मै तो जानूँ , बाकी हूँ अन्जाना |
ना चाहो तो ना आओ , हमदम गरीबखाना ,
कैसे सिखाऊँ तुमको , वादों का अब निभाना |
बहुत अच्च्छा लिखा है.

अनूप शुक्ल ने कहा…

शानदार गजल! एक हप्ता हो गया। कुछ नया लिखा जाये।

बवाल ने कहा…

ना चाहो तो ना आओ , हमदम गरीबखाना ,
कैसे सिखाऊँ तुमको , वादों का अब निभाना |

क्या बात है सर बहुत ख़ूब ग़ज़ल. अहा ! क्या कहना !

MUFLIS ने कहा…

bhaav aur lafz bahot achhe haiN.
mn ke ehsasaat ko yooN pirona koi aasaan kaam nhi hai...
lekin aapki hunar.mandi...kamaal !!
---MUFLIS---

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत सुंदर लिखा है आपने

मयंक ने कहा…

लिखने का रिकार्ड तो तोड़ ही रहें हैं....टिप्पणियों का भी कुछ दिन में तोड़ ही डालेंगे....
क्या लिक्खिस हैं.... दिल खुस कर दिहिन

कम से कम लोग आपकी प्रेरणा सो न सही...प्रतिस्पर्धा में ही लिखेंगे...भला तो हिंदी का ही होगा

रश्मि प्रभा ने कहा…

bahut hi achhi hai.......

Dr. shyam gupta ने कहा…

बहुत अच्छे भाव हैं, शानदार शेर हैं, पर कविताहै,गज़ल नहीं। काफ़िया व रदीफ़ का ताल मेल नहीं है।

तू गाता चल ऎ यार कोई कायदा न देख ,
कुछ अप्ना ही अन्दाज़ हो खुद्दारी गज़ल होती है।

Babli ने कहा…

वाह वाह क्या बात है! बहुत ही उन्दा लिखा है आपने !